Friday, April 12, 2024
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वेब सीरीज रिव्यू: खाकी द बिहार चैप्टर


दिल्ली अनुरूप से स्नातक। इसी तरह पहली बार दस्तावेजों में दरार। अब सोच प्रेरित ये इंसान कितना चतुर होगा। जी हां, ये कोई और लोढ़ा नहीं हैं, जो 1998 के आईपीएस अधिकारी और बिहार के शीर्ष अधिकारियों में से एक हैं। ये छोटी सी किताब ‘द बिहार डायज’ (द बिहार डायरीज) पर बॉलीवुड के मशहूर डायरेक्टर नीरज पांडे ‘खाकी’ वेब सीरीज लेकर आए हैं, जिसके निर्देशक भव धूलिया हैं। इस सीरीज के साथ नीरज पांडे और नेटफ्लिकस का नाम सबके सामने है कि एक बार तो इस सीरीज को देखा जाता है। पर ये सीरीज दर्शकों की इन उम्मीदों पर खरी उतरी है? साजी ‘खाकी द बिहार चैप्टर’ के 7वें एपिसोड में क्या नीरज पांडे के शीर्ष निदेशक की कोटी के माध्यम से गड़बड़ी साबित हुई है या नहीं। जहरीले हैं करण टक्कर, विनाश तिवारी, निकिता दत्ता और आशुतोष राणा जैसे कलाकारों से सजी वेब सीरीज ‘खाकी’ जैसी है?

‘खाकी’ की कहानी (खाकी द बिहार चैप्टर रिव्यू)
राजस्थान के रहने वाले 25 साल के अमित लोढ़ा (करण ठक्कर) नई नवेली दुल्हन के साथ बिहार का छायांकन हैं। आईपीएस बनते ही यहां उनकी पहली पोस्टिंग हुई है। जब बिहार की जनता अपराध, चोरी-चकारी, खून-खराबा और जात-पात के साथ राजनीतिक भ्रष्टाचार से जूझ रही थी तो इस जोशीले लड़के ने इस माहौल को बदलने का प्रयास किया। उसी पहली बारी में अपनी जूझ धोखे से उसने रेल हड़ताल को रोक दिया तो दूसरी बार सासंद के भाई (रवि किशन) और चंदन महतो (अपान तिवारी) को जेल जैंकर शहर को साफ कर दिया। इसके बाद उनकी पोस्टिंग शेखपुरा, बेगूसराय से लेकर मुजफ्फरपुर तक होती है। अमित लोढ़ा धीरे-धीरे बिहार के सिंघम बन गए तो दूसरी ओर अपराध के दलदल में फंस गए, छोटे जात के चंदन महतो अपराध की राजधानी के नए राजा बन गए। चंदन महतो का नरसंहार और सिंघम का अंदाज 7 एपिसोड में चल रहा है।

किया (खाकी द बिहार चैप्टर)
रवि किशन का रोल काफी छोटा है लेकिन शानदार है। करण टैक्कर और विनाश टाईक्लॉस पर नीरज पांडे ने पूरी जिम्मेदारी ली है। विनाश तिवारी ने इस जिम्मेदारी को पूरा करने का प्रयास किया है। वह चंदन की लिप्सा कहीं डरपोक तो कहीं खूंखार दिखती हैं। वहीं रफ और टफ लोढ़ा के चरित्र में करण तककर भी अपना 100% देते हैं। करण पहले भी नीरज पांडे के साथ स्पेशल ऑप्स वेब सीरीज में काम कर चुके हैं। वहीं करण जो कभी-कभी हजारों में मेरी बहनें सीरियल में बेहद खूबसूरत अंदाज में दिखती थीं। उनका नीरज पांडेय ने बहुत अच्छा उपयोग किया है। अभिनय की बात हो रही है तो आशुतोष राणा और ऐश्वर्या सुष्मिता की आकांक्षा बनती है। जिसने अपनी प्रतिभा से पहचान में जान डाल दी।

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खाकी की समीक्षा (खाकी द बिहार चैप्टर रिव्यू रिव्यू)
जो चंदन कभी डीजल चुराया करता था वो कैसे अपराध की दुनिया का राजा बन जाता है, इसे लेखक पूरी तरह भूनाने में मात खा जाता है। लेखक और निर्देशक दोनों ने इस सीरीज को ‘मिर्जापुर’, ‘रंगबाज’, ‘गंगाजल’ जैसी फिल्मों तक पहुंचने की कोशिश की है। बस इसी दिन की वजह से ‘खाकी’ एवरेज से ऊपर नहीं मिलते हैं। ‘पुलिस बनाम द ग्रैमिनी’ पर पहले भी कई सीरीज और फिल्में अटक चुकी हैं। इस ‘खाकी’ में उन्हें कुछ नया देखने को नहीं मिलता है।

‘स्पेशल ऑप्स’ वेब सीरीज जैसी कहानियां इस बार नीरज पांडे पैदा करने में सफल नहीं हुई हैं। यही कारण है कि इस बार रुचिता तो नीरज पांडे थे लेकिन निर्देशित के आदेश भव धूलिया के हाथों में थे जो ‘रंगबाज’ जैसी उम्मीद-ए-काबिल वेब सीरीज लेकर आए थे। भव धूलिया के साथ परेशानी ये हुई कि वह एक बार फिर हूबहू वैसी ही क्राइम वेब सीरीज के साथ हाजिर हुए हैं जिसके केलवर और ठीक वैसे ही हैं। इन सभी कारणों से ‘खाकी’ न तो संस्कार बना हुआ है और न ही बोजिल लगता है।



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