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गीतकार जावेद अख्तर बेबाक अंदाज में अपने विचार रखने के लिए जाते हैं। अब उन्होंने हिंदी भाषा और अरबी के मुद्दे पर अपनी राय रखी है और कहा है कि रिजन बेस्ड (क्षेत्र आधारित) जारी होते हैं (धर्म आधारित) नहीं। जावेद अख्तर ने कहा कि ऐसा नहीं है कि हिंदी परंपरा की भाषा है और उर्दू अभिनेत्री की। उन्होंने धर्म के आधार भाषा को चुनने की सोच को खंडित किया और कहा कि यह कथन गलत है कि अरबा एक भारतीय भाषा नहीं है। जावेद अख्तर इंडिया इंटरनेशनल सेंटर पर इस बारे में बात कर रहे थे।
एक समान होती है वही हिंदी और अरबी
जावेद अख्तर ने कहा था कि 200 साल पहले हिंदी और अरब एक जैसी होती थी लेकिन राजनीतिक कारणों से दोनों अलग हो गए थे। कोई शायद यही बताता है कि कोई कविता हिंदी कवि ने लिखी है या फिर उर्दू कवि ने। उन्होंने कहा, “यह सभी ब्रिटिश लोगों ने उत्तर भारत में सांस्कृतिक रूप से प्रचारित किया था।” जावेद अख्तर ने कहा कि अगर अरब एक मुस्लिम भाषा है तो फिर बंगाल में 10 करोड़ लोग पूर्वी पाकिस्तान हैं।
‘सरकार को दोषी नहीं ठहराया जा सकता क्योंकि..’
जावेद अख्तर ने कहा कि मलयालम लेखक मोहम्मद बशीर अरबा में थे। उन्होंने कहा कि मध्य पूर्व, उज्बेकिस्तान, कजाकिस्तान के लोग अरबी नहीं हैं, लेकिन कई भारतीय क्षेत्रों में इसे बोला जाता है। जावेद अख्तर ने कहा कि कोई भी युरुबिया को दशकों तक चला सकता है और फिर भी उसे रिवील नहीं कर सकता क्योंकि जो लोग खुद को संस्कृति का रक्षक मानते हैं, उन्होंने सही जानकारी का काम नहीं किया है।
धर्मों की भाषा से नहीं होता है
जावेद अख्तर ने कहा कि भारत और पाकिस्तान के गरीबों से पहले सिर्फ हिंदुस्तान हुआ था। इसी तरह हिंदी सिर्फ हिंदू भाषा नहीं है। जावेद अख्तर ने कहा, “यह सारी बातें धर्मों से नहीं होतीं। ये क्षेत्र धर्मों से होते हैं।” वेटरनरी स्टोरी राइटर ने इसके बारे में बताते हुए कहा कि जमीन का बंटवारा तो किया जा सकता है लेकिन भाषा का बंटवारा नहीं किया जा सकता। जावेद अख्तर ने कहा कि ऐसे कई शब्द हैं जिनमें अभी तक बदलाव नहीं किया गया है क्योंकि उनका कोई दूसरा विकल्प नहीं था।

